थॉयरायड और पित्त संबंधी रोगों में वरदान है प्राण मुद्रा

By | July 29, 2017
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थॉयरायड और पित्त संबंधी रोगों में वरदान है प्राण मुद्रा


 प्राण मुद्रा, प्राचीन योग विज्ञान की चमत्कारिक देन है। यह अपने नाम के अनुसार ही जीवन एवं स्वास्थ्य रक्षा के लिए महत्वपूर्ण है। वैसे योग और योग मुद्राओं में अनेक रोगों से बचाव एवं उनसे लड़ने की बहुत अधिक शक्ति होती है, इस बात को अब मेडिकल साइंस भी मान चुका है। प्राण मुद्रा का अभ्यास जितना ही आसान है उसके प्रभाव और फायदे उतने ही चमत्कारिक हैं। प्राण मुद्रा शरीर में पित्त (शारीरिक गर्मी और उपापचय अर्थात मेटाबोलिज्म से संबंधित लिवर से स्रावित होने वाला रस) को कम करती है और कफ़ जो जीवन शक्ति, ताकत और प्रतिरक्षा से सम्बन्धित तत्व है, को बढ़ाती है।
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अनामिका ऊँगली (रिंग फिंगर) का सम्बन्ध शरीर और मस्तिष्क के उन भागों से होता है जो पृथ्वी तत्व से सम्बन्धित है और कनिष्ठिका (सबसे छोटी ऊँगली) शरीर में जल तत्व की उत्प्रेरक होती है। हाथ का अंगूठा अग्नि तत्व से संबंधित होता है। दोनों हाथों की अनामिका और कनिष्ठिका ऊँगलियों के अगले भाग को, अंगूठे के अगले भाग से जोड़ने से प्राण मुद्रा बनती है। इसमें बहुत अधिक दबाव नहीं बनाया जाता है। अन्य उँगलियों को सीधा रखा जाता है। इसका अभ्यास कहीं भी और कभी भी किया जा सकता है। विधिवत अभ्यास के लिए सुखासन या वज्रासन में बैठकर इसको करना चाहिए और हथेलियों के पिछले भाग को जांघों पर रखकर ध्यान साँसों पर लगाते हुए अभ्यास करना चाहिए। अभ्यास के दौरान साँसें सामान्य चलनी चाहिए।

सावधानियाँ 

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जिन लोगों का वजन ज्यादा हो या जिन्हें कफ़ (जुकाम आदि बना रहता हो या स्नोफिलिया हो) की समस्या हो उन्हें यह मुद्रा ज्यादा समय तक नहीं करना चाहिए।

समय

10 से 15 मिनट दिन तीन बार कुल 30 से 45 मिनट प्रतिदिन।

फायदे

शरीर में पित्त बढ़ने तथा कफ़ घटने से निम्नलिखित परेशानियाँ एवं बीमारियाँ हो जाती हैं-

  • थॉयरायड बढ़ जाना (अच्छी भूख होने के बावजूद वजन घटना)
  • हड्डियों के जोड़ों के स्थान गर्म और लालिमा युक्त होना, संधिशोथ (Rheumatoid Arthritis), जोड़ों में अस्थिरता
  • थकान बनी रहना, सामान्य दुर्बलता, सहनशीलता कम होना
  • रोग प्रतिरोधक क्षमता में गड़बड़ी हो जाना  ( संक्रामक रोग, जुकाम आदि बार-बार होना)
  • मानसिक तनाव, क्रोध, चिड़चिड़ापन, ईर्ष्या, घमण्ड, अधीरता, हर काम में जल्दी दिखाना
  • भुलक्कड़पन
  • गर्मी, तनाव और शोर सहन न होना
  • बीमारियां जो गर्मियों में और ख़राब हो जाती हो
  • सूजन की समस्याएँ (वे सभी रोग जो जिनके अंग्रेजी नाम itis पर ख़त्म होते हैँ)
  • अनिद्रा
  • उच्च रक्तचाप
  • अथेरो-स्क्लेरोसिस (रक्त वाहिनियों का कठोर एवम् संकरा हो जाना)
  • मुँह, गले एवम् पेट में जलन, छाले युक्त अल्सर, एसिडिटी, अल्सरेटिव कोलाइटिस
  • पतला, खूनी दस्त (पेंचिश)
  • पेशाब कम होना और मूत्र मार्ग में जलन होना
  • अत्यधिक, दुर्गंधयुक्त पसीना
  • अत्यधिक, दर्दनाक मासिक धर्म
  • आँखों में जलन अथवा आँखें लाल या सूखी होना, मोतियाबिंद
  • सूखी, लाल, गर्म, बुढ़ापे जैसी त्वचा या त्वचा पर चकत्ते, पित्ती, कुष्ठ रोग आदि होना
  • सूखे, कम घने और भूरे (पके जैसे) बाल
  • पीलिया
  • समय से पहले बुढ़ापा आना
  • शरीर के भीतर पृथ्वी और जल तत्व की कमी की वजह से होने वाले विकार।

उपरोक्त सभी रोगों को ठीक करने में इस मुद्रा का विशेष महत्व है। इसके अभ्यास से पतले व्यक्ति का वजन बढ़ता है और शक्ति प्राप्त होती है। बीमारी की स्थिति में भी इस मुद्रा का अभ्यास किया जा सकता है।

Source

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